रईसी ने अपन मंत्रिमंडल के सदस्यों को चुन लिया है। विदेश मंत्री का भी चयन कर लिया गया है जो जवाद ज़रीफ़ का स्थान लेंगे। जवाद ज़रीफ़ परमाणु समझौते को बहाल करवा पाने में नाकाम रहे जिसकी वजह से कहीं न कहीं उनकी विश्वसनीयता को धक्का लगा।
ईरानी मूल के टीकाकार मुहम्मद जवाद मूसवीज़ादे ने नैश्नल इंट्रेस्ट में छपने वाले अपने लेख में लिखा कि ईरानी मीडिया ने कई हफ़्ते से नए विदेश मंत्री के बारे में अटकलें लगाना शुरू कर दिया था। अली बाक़ेरी कनी, हुसैन अमीर अब्दुल्लाहियान, महदी सफ़री, अली हुसैनी ताश जैसे नामों के बारे में अटकलें लगाई जा रही थीं।
हुसैन अमीर अब्दुल्लाहियान 57 साल के हैं। वह 2010 से 2015 तक विदेश उपमंत्री के पद पर कार्यरत रहे। इस समय वह संसद सभापति के विशेष सलाहकार हैं। अमीर अब्दुल्लाहियान अरबी और अंग्रेज़ी भाषाएं आसानी से बोलते हैं।
अब्दुल्लाहियान उस टीम का भी हिस्सा थे जिसने ईरान चीन 25 वर्षीय स्ट्रैटेजिक समझौते तक पहुंचने वाली महत्वपूर्ण वार्ता की थी।
रईसी के शासनकाल में ईरान अमरीका संबंधों के बारे में पूछे गए सवाल के जवाब में हुसैन अमीर अब्दुल्लाहियान ने सीएनएन से बातचीत में कहा था कि अमरीका हमेशा मौक़ा गवांता है। इसकी वजह अमरीका का रवैया है। अब्दुल्लाहियान ने अमरीका से संबंधों या परमाणु समझौते पर सीधा हमला नहीं किया। इस तरह उन्होंने एक नर्म संकेत दिया था।
अब्दुल्लाहियान ने तीन साल पहले ट्वीट किया था कि अमरीका के साथ वार्ता पर पाबंदी नहीं है। दोनों देशों के बीच विदेश मंत्रियों के स्तर पर दर्जनों बार बातचीत हो चुकी है। तीन दौर तो बग़दाद में हुए जिसमें मैं ख़ुद भी शामिल हुआ। प्राब्लम अमरीका की धौंस, आपराधिक कार्यवाहियां और बार बार दोहराई जाने वाली ग़लतियां हैं।
यह तो तय है कि विदेश मंत्री के रूप में अब्दुल्लाहियन के चयन का मतलब यह है कि पश्चिम के साथ आने वाले समय में होने वाली किसी भी वार्ता में उनकी बड़ी भूमिका होगी। यह वार्ता परमाणु समझौते के बारे में और पश्चिम की ओर से ईरान पर लगे प्रतिबंधों के बारे में होगी।
प्रतिबंध हटवाना राष्ट्रपति रईसी की भी महत्वपूर्ण प्राथमिकता है। उन्होंने शपथ ग्रहण समारोह में कहा कि हम हर उस कूटनयिक योजना का समर्थन करेंगे जो ईरानी जनता पर लगे प्रतिबंधों को हटवाने में मददगार हो।
अब्दुल्लाहियान संसद सभापति के सलाहकार हैं उनके नाम को आसानी से संसद की स्वीकृति भी मिल जाएगी। मगर यह भी तय है कि वह सर्वोच्च नेता की इच्छा के अनुसार ही काम करेंगे।
अब सवाल यह है कि जवाद ज़रीफ़ के जाने के बाद कूटनीति के मंच पर जो शून्य उत्पन्न होगा क्या अब्दुल्लाहियान उसको भर पाएंगे? इस सवाल का जवाब आने वाला समय देगा।
स्रोतः नैश्नल इंट्रेस्ट